करंट अफेयर्स
आइए जानते हैं ,भारत का पहला बजट कब और किसने पेश किया था?
भारत का पहला स्वतंत्र केंद्रीय बजट 26 नवंबर 1947 को आर.के. शनमुखम चेट्टी ने पेश किया था।
ब्रिटिश काल का पहला बजट
भारत में आधुनिक बजट की शुरुआत 1860 में हुई, जब जेम्स विल्सन ने लंदन में ब्रिटिश संसद के समक्ष इसे प्रस्तुत किया। यह 1857 के विद्रोह के नुकसानों की भरपाई के लिए था।
स्वतंत्र भारत का पहला पूर्ण बजट
26 नवंबर 1947 का बजट अंतरिम था, जबकि लोकतांत्रिक भारत का पहला पूर्ण बजट 28 फरवरी 1950 को जॉन मथाई ने पेश किया।
शाम को पेश होने की परंपरा
आजादी के बाद 1999 तक बजट शाम 5 बजे पेश होता था, जो ब्रिटिश समय के अनुसार इंग्लैंड में सुबह होने के कारण था। 1999 में यशवंत सिन्हा ने पहली बार सुबह 11 बजे इसे प्रस्तुत किया
करंट अफेयर्स
आइए जानते हैं कि भारत के किस शहर को कहा जाता है ‘इत्र की राजधानी’
भारत का शहर कन्नौज (उत्तर प्रदेश) ‘इत्र की राजधानी’ के नाम से जाना जाता है।
यह शहर प्राकृतिक फूलों से बने पारंपरिक अत्तर के उत्पादन के लिए सदियों से प्रसिद्ध है।
विशेषताएं
- कन्नौज में 200+ इत्र भट्टियाँ हैं, जो गुलाब, चमेली आदि से इत्र बनाती हैं।
- कन्नौज अत्तर को GI टैग मिला है, जो इसकी प्रामाणिकता सुनिश्चित करता है
बनाने की प्रक्रिया
- सामग्री: ताजे फूल (गुलाब, चमेली, बेला आदि) 50-60 किलो, चंदन का तेल (बेस ऑयल) और पानी।
- चरण: तांबे के बड़े बर्तन (डेग) में फूल डालें, पानी मिलाकर चिकनी मिट्टी से सील बंद करें। धीमी आंच लगाएं ताकि भाप बने।
- भाप को चोंगा (बांस/तांबे की नली) से ठंडे पानी वाली नांद में रखे भभका (रिसीवर) में भेजें, जहाँ संघनन होकर सुगंधित तेल अलग हो।
समय और पैकिंग
प्रक्रिया में 8-12 घंटे लगते हैं (मिट्टी इत्र में 2-3 दिन)। इत्र को छानकर कांच/पीतल की बोतलों में भरते हैं। यह पूरी तरह प्राकृतिक और बिना केमिकल का होता है।
करंट अफेयर्स
जानिए कैसा है भारत का पहला AI आंगनवाड़ी? ऐसे होती है डिजिटल पढ़ाई
भारत का पहला AI (कृत्रिम बुद्धिमत्ता) आधारित आंगनवाड़ी महाराष्ट्र के नागपुर जिले के हिंगना तहसील के वडधामना गांव में खुला है। इसे ‘मिशन बाल भरारी’ पहल के तहत नागपुर जिला परिषद द्वारा शुरू किया गया है। इस AI आंगनवाड़ी को हाल ही में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने उद्घाटित किया। यह देश में ग्रामीण डिजिटल शिक्षा में एक बड़ा परिवर्तन लाने की कोशिश है।
यहां के बच्चों की पढ़ाई अब पारंपरिक चॉक-स्लेट की बजाय पूरी तरह डिजिटल हो चुकी है – कक्षा में स्मार्टबोर्ड, वर्चुअल रियलिटी (VR) हेडसेट जैसे अत्याधुनिक उपकरण लगे हैं। बच्चे AI-सक्षम स्मार्टबोर्ड के जरिए रंग-बिरंगे, इंटरेक्टिव कंटेंट के साथ गिनती, वर्णमाला, रंग और कहानियां सीखते हैं। शिक्षक बच्चों की प्रगति को ट्रैक करने के लिए AI-सिस्टम की मदद लेते हैं, जिससे हर बच्चे की व्यक्तिगत जरूरत के अनुसार सामग्री और गतिविधियां मिलती हैं। यह केंद्र बच्चों में डिजिटल लर्निंग की आदत शुरू से ही डाल रहा है, जिससे उनका स्किल बेस भविष्य के लिए मजबूत बनता है।
यह AI आंगनवाड़ी सुविधाओं के मामले में प्राइवेट स्कूलों को टक्कर दे रही है — यहां बच्चों का नामांकन दोगुना हो गया है और डिजिटल गैप तेजी से कम हो रहा है। बच्चों की पढ़ाई अब आधुनिक, रंगीन और टेक्नोलॉजी से लैस माहौल में चल रही है, जो ग्रामीण शिक्षा की गुणवत्ता और आकर्षण दोनों को एक नई ऊंचाई देता है।
संक्षिप्त में:
- अब चॉक-स्लेट की जगह स्मार्टबोर्ड व डिजिटल टूल्स।
- VR हेडसेट, AI-आधारित प्रगति ट्रैकिंग, रंगीन व इंटरेक्टिव कंटेंट।
- बच्चों की उपस्थिति व नामांकन में भारी वृद्धि।
- डिजिटल लर्निंग गांवों तक पहुंची, जिससे शिक्षा और ज्यादा रोचक व प्रभावशाली हुई है।
करंट अफेयर्स
ट्रंप के एक फैसले से एजुकेशन सिस्टम में दिखे ये 3 बड़े असर
डोनाल्ड ट्रंप के संघीय शिक्षा विभाग (US Department of Education) को खत्म करने के फैसले से अमेरिकी शिक्षा सिस्टम में तीन बड़े असर साफ तौर पर देखे जा सकते हैं:
- राज्यों और स्थानीय बोर्ड्स को शिक्षा नीति में पूरी आज़ादी
ट्रंप के आदेश के बाद शिक्षा की ज़िम्मेदारी संघीय सरकार से हटकर राज्यों और स्थानीय एजुकेशन बोर्ड्स को सौंप दी जाएगी। इसका मतलब है कि हर राज्य अपने हिसाब से स्कूलों और कॉलेजों की नीतियां, फंडिंग और नियम तय करेगा। इससे शिक्षा नीति में राष्ट्रीय स्तर पर एकरूपता कम हो सकती है, जिससे स्कूलों के स्तर और सुविधाओं में अंतर बढ़ने की आशंका है। - फेडरल फंडिंग और छात्रों के लिए खास कार्यक्रमों पर असर
संघीय शिक्षा विभाग द्वारा प्रदान की जाने वाली पेल ग्रांट, टाइटल I (कम आय वाले स्कूल जिलों की सहायता) और विकलांग बच्चों के लिए फंडिंग जैसे कार्यक्रमों का भविष्य अस्थिर हो गया है। ट्रंप ने भरोसा दिया है कि ऐसे जरूरी कार्यक्रमों को अन्य विभागों या एजेंसियों में स्थानांतरित किया जाएगा, लेकिन प्रक्रिया और प्रभाव अभी स्पष्ट नहीं है। खासकर कमजोर आर्थिक स्थिति वाले छात्रों की ट्यूशन फीस में राहत और सिविल राइट्स संबंधी सुरक्षा पर नकारात्मक असर पड़ सकता है। - रिसर्च, मूल्यांकन और फेडरल सुपरविजन में कमी
शिक्षा मंत्रालय में बड़े पैमाने पर छंटनी (कर्मचारियों की संख्या लगभग आधी हो गई) और विभाग को खत्म करने के कदम से एजुकेशनल रिसर्च, स्टूडेंट टेस्टिंग और पूरे देश में शिक्षा गुणवत्ता के आकलन का काम प्रभावित हुआ है। ‘नेशनल सेंटर फॉर एजुकेशन स्टैटिस्टिक्स’ सहित कई एजेंसियों के कार्य धीमे पड़ गए हैं, जिससे देशभर के छात्रों के डेटा का मापन और नीति निर्माण प्रभावित हो सकता है।
इन तीन बड़े प्रभावों में सबसे बड़ा बदलाव शिक्षा में विकेंद्रीकरण और राष्ट्रीय स्तर पर नियम एवं संसाधनों के अंतर के रूप में सामने आ सकता है। इसके विरोध में पब्लिक स्कूल्स, छात्र संघ और शिक्षक संघ चिंता जता चुके हैं कि इससे कमजोर तबकों के बच्चों की शिक्षा प्रभावित होगी और पूरे देश में शिक्षा की गुणवत्ता में असमानता और भी गहरी हो जाएगी।
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