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विदेशी शिक्षा

अमेरिका में नए ग्रेजुएट स्टूडेंट्स को डिग्री के बावजूद जॉब मिलना बेहद मुश्किल, रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

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अमेरिका में नए ग्रेजुएट स्टूडेंट्स को डिग्री के बावजूद जॉब मिलना बेहद मुश्किल हो गया है, और हालात 2025 में काफी चिंताजनक हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक केवल 30% नए पासआउट छात्रों को ही अपनी पढ़ाई से जुड़ी फील्ड में फुल-टाइम नौकरी मिली है—बाकी या तो बेरोजगार हैं या अपनी फील्ड के बाहर काम करते हैं.

ताज़ा रिपोर्ट और आँकड़े

  • सेंगेज ग्रुप ग्रेजुएट एम्प्लॉयबिलिटी रिपोर्ट 2025 के अनुसार, आधे से ज्यादा नए ग्रेजुएट्स खुद मानते हैं कि कॉलेज की पढ़ाई उन्हें जॉब मार्केट के लिए तैयार नहीं कर पाई.
  • 2025 के मार्च में 22–27 साल के युवाओं की बेरोजगारी दर 5.8% तक पहुंच गई, जो महामारी को छोड़कर पिछले 12 सालों में सबसे ज्यादा है.
  • हालिया डाटा यह भी दर्शाता है कि अमेरिका में 9 लाख से ज्यादा नौकरियां पिछले साल की तुलना में कम हो गई हैं, जिससे हजारों विदेशी स्टूडेंट्स और वर्कर्स ज़बरदस्त परेशानी में हैं.

मुख्य वजहें

  • कंपनियों को जो स्किल्स चाहिए और कॉलेज में जो सिखाया जाता है, उसमें बड़ा गैप है.
  • OPT और H-1B वीजावाले युवाओं को कंपनियाँ हेल्प नहीं कर रही—स्पॉन्सरशिप न मिलने, ओपनिंग्स घटने और इंटरव्यू के बाद भी रिजेक्शन जैसे हालात आम हो चुके हैं.
  • टेक, फाइनेंस, कंसल्टिंग सहित कई क्षेत्रों में भर्ती लगभग बंद है और इंडियन स्टूडेंट्स को सबसे ज्यादा झटका लग रहा है.
  • इन हालातों की वजह से एजुकेशन लोन चुकाना भी मुश्किल साबित हो रहा है.

इंडियन स्टूडेंट्स का अनुभव

  • कई विद्द्यार्थियों ने 4000 से भी ज़्यादा जगह अप्लाई किया, फिर भी जॉब नहीं मिली.
  • लगातार रिजेक्शन और भारी दबाव के चलते मानसिक तनाव बढ़ा है.

क्या सोचें आगे

  • अगले 1–2 साल तक यूएस डिग्री लेने वालों को बहुत सोच समझकर कदम उठाना चाहिए, क्योंकि जॉब मार्केट की स्थिति फिलहाल बहुत कठिन बनी हुई है.
  • सिर्फ टॉप यूनिवर्सिटी और स्मार्ट स्किल के साथ ही सफलता का चांस है, वरना रिस्क बहुत बढ़ गया है.

इस तरह, अमेरिका में जॉब के लिए डिग्री पर्याप्त नहीं रह गई है, और नई ग्रेजुएट्स को अपने फ्यूचर की प्लानिंग भली-भांति करनी होगी.

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करियर गाइडेंस

जर्मनी में पढ़ने जा रहे भारतीय छात्र जानें, पार्ट-टाइम जॉब कैसे मिलेगी

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जर्मनी में पढ़ने वाले भारतीय छात्र पार्ट‑टाइम जॉब से अपने खर्चे आसानी से कवर कर सकते हैं, लेकिन वीजा नियम, जर्मन भाषा और जगह‑सर्च दोनों पर ध्यान देना बहुत जरूरी है।


1. पार्ट‑टाइम जॉब के नियम (छात्रों के लिए)

  • जर्मन स्टूडेंट वीजा के तहत ज्यादातर छात्रों को हफ्ते में 120 फुल डे या 240 हाफ‑डे जॉब की इजाज़त है, यानी करीब 20 घंटे प्रति सप्ताह क्लास के दौरान।
  • सेमेस्टर ब्रेक में आप फुल‑टाइम काम कर सकते हैं, लेकिन कुल लिमिट इन्हीं 120/240 दिनों के अंदर रखना होता है ताकि वीजा परेशानी न हो।

2. आम पार्ट‑टाइम जॉब के ऑप्शन

इन जॉब्स पर ज्यादातर भारतीय स्टूडेंट्स काम करते हैं:

  • कैफे, रेस्तरां, बेकरी, फास्ट‑फूड चेन में वेटर / कैशियर
  • सुपरमार्केट, रिटेल शॉप में बिलिंग, स्टॉकिंग
  • डिलीवरी (फूड, ऑनलाइन शॉपिंग), ट्यूशन टीचर (गणित, कंप्यूटर, भारतीय भाषाएं)
  • यूनिवर्सिटी में रिसर्च असिस्टेंट, लैब असिस्टेंट या इंटरनशिप टाइप वर्क।

3. कहां ढूंढें जॉब ऑनलाइन?

ये प्लेटफॉर्म जर्मनी में पार्ट‑टाइम जॉब के लिए बहुत इस्तेमाल होते हैं:

  • Stepstone.de, Indeed.de, Stellenanzeigen.de – बड़े जॉब पोर्टल, यहां “Minijob” या “Teilzeit” फिल्टर रखें।
  • LinkedIn, Facebook Groups (जैसे “Jobs in Berlin / Munich / Frankfurt for students”) – लोकल ऑफर जल्दी मिलते हैं।
  • Campus‑specific पोर्टल और यूनिवर्सिटी करियर सेंटर – अक्सर ऑन‑कैंपस जॉब और रेस्तरां/कैंटीन में वेकेंसी निकलती हैं

4. चाहिए क्या बेसिक चीजें?

  • जर्मनी आने से पहले थोड़ा‑बहुत जर्मन सीख लें – रेस्तरां, सुपरमार्केट या डिलीवरी जॉब के लिए जर्मन बहुत फायदेमंद है, हालांकि आईटी/कैंपस जॉब में अंग्रेजी भी चल सकती है।
  • आवश्यक दस्तावेज: पासपोर्ट, वीज़ा, रजिस्ट्रेशन (Anmeldung), बैंक अकाउंट, थोड़ा अनुभव वाला रिज्यूमे (CV in German/English)।

5. भारतीय छात्रों के लिए अच्छा है या नहीं?

  • जर्मनी में अभी भी स्किल्ड वर्कर की कमी है, इसलिए छात्रों के लिए वीज़ा + जॉब दोनों का ऑप्शन अच्छा है, खासकर इंजीनियरिंग, IT और हेल्थकेयर में।
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इनोवेशन और स्टार्टअप

भारत-EU के बीच हुई FTA डील से यूरोप में भारतीयों के लिए नौकरी और पढ़ाई होगी आसान

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भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच 27 जनवरी 2026 को फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) पर हस्ताक्षर हुए, जो भारतीयों के लिए यूरोप में नौकरी और पढ़ाई के रास्ते खोलेगा।
यह डील 18 साल की लंबी वार्ता के बाद हुई, जिसमें व्यापार, सेवाओं और लोगों की आवाजाही को बढ़ावा दिया गया।

नौकरी और पढ़ाई पर असर

FTA से IT, सर्विस सेक्टर और अन्य प्रोफेशनल्स के लिए वीजा प्रक्रिया आसान होगी, जिससे लाखों भारतीयों को EU देशों (जैसे जर्मनी, फ्रांस) में काम के अवसर मिलेंगे।​
शिक्षा क्षेत्र में स्टूडेंट वीजा और स्किल्ड वर्कर मोबिलिटी बढ़ेगी, खासकर MSMEs और लेबर-इंटेंसिव सेक्टर्स में।​
निर्यात दोगुना होने से रोजगार सृजन होगा, लेकिन तुर्की जैसे देशों के सामान पर पाबंदी रहेगी।​

आर्थिक फायदे

भारत को EU के 97% टैरिफ लाइंस में एक्सेस मिलेगा, जबकि EU को भारत के 92% बाजार में।​
ऑटो सेक्टर में इंपोर्ट ड्यूटी 110% से घटकर 10% होगी (2.5 लाख यूनिट कोटा), लेकिन EVs को 5 साल छूट।

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विदेशी शिक्षा

गिरते रुपये ने विदेश में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों का खर्च अचानक बढ़ा दिया है, जिससे परिवारों पर बढ़ा आर्थिक बोझ

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हां, गिरते रुपये ने विदेश में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के लिए ट्यूशन फीस, रहने-खाने और अन्य खर्चों को अचानक बढ़ा दिया है, जिससे परिवारों पर भारी आर्थिक दबाव पड़ रहा है।

रुपये की गिरावट का स्तर

भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 90 रुपये के आसपास पहुंच गया है, जो पिछले आठ-नौ महीनों में 84 रुपये से लगभग 7% की गिरावट दर्शाता है। इस कमजोरी से विदेशी मुद्रा में चुकाए जाने वाले सभी खर्च सीधे महंगे हो जाते हैं, खासकर अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में।

छात्रों पर प्रभाव

2024 में 7.6 लाख भारतीय छात्रों ने उच्च शिक्षा के लिए विदेश का रुख किया, लेकिन अब मासिक खर्च 20-30 हजार रुपये और सालाना 2-3 लाख रुपये अतिरिक्त बढ़ गया है। उदाहरणस्वरूप, 50,000 डॉलर की सालाना फीस पहले 41.5 लाख रुपये थी, जो अब 44.7 लाख रुपये हो गई। एजुकेशन लोन के ब्याज और वीजा प्रोसेसिंग फीस में भी 4% की बढ़ोतरी हुई है।

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परिवारों की चुनौतियां

परिवार घरेलू खर्चों के साथ लोन किस्तें चुकाते हुए अतिरिक्त बोझ झेल रहे हैं, जबकि छात्र पार्ट-टाइम नौकरियां कर रहे हैं। कुछ छात्र सस्ते देशों पर विचार कर रहे हैं या पढ़ाई बीच में छोड़ने की सोच रहे हैं।

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